भावों को शब्द रूप

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संसद सर्वोपरि है .......

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लोकतंत्र का पावन मंदिर संसद गिरिजाघर है
मस्जिद ,गुरुद्वारा संसद है ,संसद सर्वोपर है
लोकतंत्र के मंदिर को अब साधक से ही डर है
मंदिर के अंदर अब तो अपराधी भी निडर है
जब चोरों को चोर कहो तो संसद क्यूँ थर्राती है
लोकपाल पारित करने से संसद क्यूँ कतराती है
संसद में जनता के प्रतिनिधि ईश्वर ही बन जाते हैं
जनता के सेवक होकर जनता को आँख दिखाते हैं
जो संसद की प्रभु सत्ता से स्वार्थ सिद्धि कर पाते हैं
ऐसे ही सांसद लोकपाल के नाम से ही डर जाते है
जनता को मानो जनार्दन मत उसका अपमान करो
जनता की आवाज सुनो और लोकपाल निर्माण करो ….
सत्यव्रत शुक्ल ….

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

चन्दन राय के द्वारा
May 6, 2012

Dear Satyvart, what a beautiful poem written on our parliament, Nice thoughts buddy

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 7, 2012

    Dear Chandan Ray ji, Thanks for appricitation & hope same for future .

nishamittal के द्वारा
May 3, 2012

सत्यव्रत जी,दिनेश जी सेसहमत हूँमैं.परिवर्तन आवश्यक है,परन्तु आवश्यकता है,संगठित होने की तथा केवल और केवल देश के लिए सोचने की.

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 3, 2012

    निशा जी नमस्कार ,पुनः आपका समर्थन पाकर अच्छा लगा |और आपके विचार से भी मैं सहमत हूँ |

dineshaastik के द्वारा
May 3, 2012

सत्यव्रत जी आपके विचारों से पूर्णतः सहमत  एवं  पूरा समर्थन।  यदि मंदिर में शैतान की मूर्ती रख  दी जाय तो क्या वह मंदिर पूजा करने योग्या रहता है। क्या शैतान के शैतान भी नहीं कह सकते हैं, अतः सिद्ध  है कि शैतान बहुत ही  ताकतवर है। बिना संगठित  हुये एवं क्राँति के इन शैतानों का वध  नहीं हो सकता।

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 3, 2012

    दिनेश जी नमस्कार और धन्यवाद समर्थन के लिए ,और मैं भी आपकी संघठित होने वाली बात से पूर्णतया सहमत हूँ |आभार

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 2, 2012

शुक्ल जी बहुत सुन्दर ..यही तो प्रश्न चिन्ह लगा है जिसे हम अपने बीच से इतने प्यार से चुन चुन कर भेजते हैं विश्वास के साथ की वो हमारा प्रतिनिधित्व करेगा वही वहां लामबंद हो जाता है कुर्सी का नशा ..अपराधियों को बचाना ..लोगों पुलिस ईमानदार पर दबाव बनाना आदि गन्दी राजनीति ….आइये इन्हें होश में लाने हेतु सब मिल कुछ करें … हरी ओउम भ्रमर ५

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 2, 2012

जब चोरों को चोर कहो तो संसद क्यूँ थर्राती है लोकपाल पारित करने से संसद क्यूँ कतराती है संसद में जनता के प्रतिनिधि ईश्वर ही बन जाते हैं जनता के सेवक होकर जनता को आँख दिखाते हैं शुक्ल जी बहुत सुन्दर ..यही तो प्रश्न चिन्ह लगा है जिसे हम अपने बीच से इतने प्यार से चुन चुन कर भेजते हैं विश्वास के साथ की वो हमारा प्रतिनिधित्व करेगा वही वहां लामबंद हो जाता है कुर्सी का नशा ..अपराधियों को बचाना ..लोगों पुलिस ईमानदार पर दबाव बनाना आदि गन्दी राजनीति ….आइये इन्हें होश में लाने हेतु सब मिल कुछ करें … हरी ओउम भ्रमर ५


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