भावों को शब्द रूप

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बरस रहा है रिम झिम सावन , फिर तुम मिलने आजाओ

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बरस रहा है रिम झिम सावन , फिर तुम मिलने आजाओ
ठंडी ठंडी रातों में ,तपिश प्यार की दे जाओ
प्यासे हैं हम भरा है गागर ,तुम गगरी छलका जाओ
अब तन्हा नहीं कटती रातें, तुम तन्हाई मिटा जाओ

हाथों से स्पर्श करो और ,मन में दीप जला जाओ
आँखों से तुम गीत पढ़ो और ,मुझको मीत बना जाओ
होठों से कुछ और करेंगे ,आँखों से तुम बात कहो
मैं समझूं आँखों की भाषा ,तुम आँखों से काव्य गढो


मैं तुमको बाहों में भर लूं ,तुम मेरा प्रतिरोध करो
खेलूँ तेरी जुल्फों से तो ,तुम मुझसे गतिरोध करो
आत्मसमर्पण तुम करदो और ,मैं तुमको ले सेज चढूं
मूक सहमति तेरी पाकर ,मैं फिर से नई मूर्ति गढूं

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
May 15, 2012

आदरणीय सत्यव्रत जी नमस्कार, बहुत बेसब्र कविता है भाई. मै शीर्षक पढ़ कर आया सोचा था बरस रहा है सावन तो फिर सावन की कुछ बात करेंगे, बौछारों से खेलेंगे कुछ कलियाँ चुनेंगे, देखेंगे कुछ सपने कुछ नए बुनेंगे, पर बेसब्र बादल ठहरे है कहीं धरती के तृप्त होने तक, बरसेंगे पल दो पल फिर चल देंगे. यदि आपने रचना को थोड़ा और विस्तार दिया होता तो और भी रुचिकर होती.

shashibhushan1959 के द्वारा
May 13, 2012

आदरणीय शुक्ल जी, सादर ! यह रचना तो दर्पण के सामान आपके भावों को दर्शा रहा है ! सधन्यवाद !

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 13, 2012

    प्रणाम श्रीमान , धन्यवाद और आपने प्रतिक्रिया भी सही की है |कोई भी कविता या लेख खुदको या दुसरे को ध्यान में रखकर ही लिखा जा सकता है किन्तु इस कविता मैं बहुत से लोगों की अभिव्यक्ति छुपी है |

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 12, 2012

वाह शुक्ल जी बहुत खूब. आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हों.

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 12, 2012

    दुबे जी धन्यवाद ,,,,विशेषकर शुभकामनाओ के लिए ……

yogi sarswat के द्वारा
May 12, 2012

हाथों से स्पर्श करो और ,मन में दीप जला जाओ आँखों से तुम गीत पढ़ो और ,मुझको मीत बना जाओ होठों से कुछ और करेंगे ,आँखों से तुम बात कहो मैं समझूं आँखों की भाषा ,तुम आँखों से काव्य गढो भैया सत्यव्रत जी , नमस्कार ! अभी तो बाहर कड़कती गर्मी पड़ रही है लेकिन आपकी कविता ने सच में सावन वर्षा दिया ! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ !

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 12, 2012

    योगी जी नमस्कार …..धन्यवाद ……..मैं अभी मिजोराम मैं हूँ और अभी यहाँ खूब बरसात हो रही है तभी ये सावन की कविता लिख ली |

चन्दन राय के द्वारा
May 12, 2012

सत्यव्रत शुक्ल, आपने भी क्या खूब बरसाया प्रेम बिरह के रंग , मजा आ गया

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 12, 2012

    राय साहब नमस्कार ,आपको यदि मजा आया तो मेरा लेखन कुछ हद तक सफल हुआ |समर्थन के लिए पुनः धन्यवाद


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