भावों को शब्द रूप

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होता हूँ विवश कभी जो माँ ,बस तुम्ही याद मुझे आती हो

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मेरे आधार में तुम हो ,मेरे आकार में तुम हो
तुम्ही सांसो में हो मेरी ,लहू कि धार में तुम हो
बनी सम्बल हो दुखों में ,मेरी मुस्कान में तुम हो
बचाने को मेरी कस्ती भरी मझधार में तुम हो

तुम करुणा का सागर हो ,मर्यादा कि मूरत हो
तुम देवों की पूज्यनीय,तुम ही सृष्टि की सूरत हो
मैं ऋणी तुम्हारी ममता का तुम इतना प्यार लुटाती हो
होता हूँ विवश कभी जो माँ ,बस तुम्ही याद मुझे आती हो

बाल्यावस्था से अबतक माँ, प्यार तुम्हारा पाया है
खुद को कष्टों से रंजित कर तुमने फ़र्ज़ निभाया है
मेरी खुशियों की खातिर माँ तूने सर्वस्व लुटाया है
अपनी छोटी सी चोटों पर तेरी आँखों में सागर पाया है

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 14, 2012

मेरी खुशियों की खातिर माँ तूने सर्वस्व लुटाया है अपनी छोटी सी चोटों पर तेरी आँखों में सागर पाया है बहुत बढ़िया……. पंक्तियाँ……..

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 14, 2012

    पियूष जी नमस्कार ,हार्दिक धन्यवाद |

shashibhushan1959 के द्वारा
May 13, 2012

आदरणीय शुक्ला जी, सादर ! भावनापूर्ण रचना ! सुन्दर !

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 13, 2012

    परम आदरणीय शशि जी नमस्कार . आपकी प्रतिक्रिया मेरे उत्साहवर्धन के लिए अति आवश्यक है |आभार

rajhans के द्वारा
May 13, 2012

नमस्कार शुक्ल जी! आपने टाइम मशीन से, मधुर, कर्णप्रिय छंदों वाले काव्य युग की सैर करा दी!

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 13, 2012

    राज जी नमस्कार ,उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |भविष्य में भी आपके समर्थन का आकांक्षी रहूँगा |

nishamittal के द्वारा
May 13, 2012

बहुत सुन्दर श्रद्धापूर्ण भावों से युक्त रचना सत्यव्रत जी.

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 13, 2012

    निशा जी प्रणाम एवं धन्यवाद ..

dineshaastik के द्वारा
May 13, 2012

सत्यव्रत जी नमस्कार, माँ कि प्रति सुन्दर भाव पूर्ण  रचना की प्रस्तुति के लिये बधाई….

    satyavrat shukla के द्वारा
    May 13, 2012

    आस्तिक जी नमस्कार ,और बधाई के लिए हार्दिक धन्यवाद


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